अगर पत्रकारिता को बचाना है, तो पहले पत्रकारों को खुद अपने अस्तित्व को बचाना होगा।

अगर पत्रकारिता को बचाना है, तो पहले पत्रकारों को खुद अपने अस्तित्व को बचाना होगा।

Written by Prem Prakash Agarwal 2025-08-07 News
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ। एक ऐसा स्तंभ, जो सच्चाई की नींव पर खड़ा है, जो सत्ता से सवाल करता है, जो अंधेरों में दबे सच को उजाले में लाता है। लेकिन विडंबना देखिएः यह स्तंभ आज भी खड़ा है, मगर इसके कंधे झुके हुए हैं, इसके सिपाही थके हुए हैं, और उनकी कलमों की धार, थकान में मद्धम पड़ रही है। आज पत्रकारों की हालत किसी से छुपी नहीं है। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया में बंटने के बाद पत्रकारों की ताक़त बिखर चुकी है। कभी एकजुट होकर समाज की आवाज़ उठाने वाला यह वर्ग, अब खेमों में बंटकर अपनी ही आवाज़ खो बैठा है। पत्रकार एक अजीब पेशा हैः वह सबको सुर्खियों में लाता हैः नेता, अभिनेता, आंदोलनकारी, समाजसेवी सबको। लेकिन खुद गुमनामी में जीता है। कुछ बड़े नामों को छोड़ दें, तो देश के अधिकांश पत्रकार मुफ़लिसी, असुरक्षा और अनिश्चित भविष्य में जीते हैं। कई इस पेशे को बीच रास्ते छोड़ देते हैं, कई मानसिक दबाव में टूट जाते हैं। और जब यह टूटन गहराती है, कई बार पत्रकार नशे की गिरफ्त में चला जाता है। शराब, नींद की गोलियां, या अन्य मादक चीज़ों का सहारा लेता है, खुद को संभालने के लिए, या खुद को भुलाने के लिए। धीरे-धीरे उसका परिवार बिखरने लगता है। कल जो अपने लिए लड़ता था, अब अपनों से भी हारने लगता है। उसका घर, जो कभी सुकून की जगह था, अब अस्थिरता और तनाव का केंद्र बन जाता है। लेकिन सवाल यह हैः जिम्मेदार कौन है? सिर्फ व्यवस्था? सिर्फ कॉर्पाेरेट? सिर्फ राजनीति? नहीं। इस स्थिति का जिम्मेदार स्वयं पत्रकार भी है। संगठन की कमी, एकजुटता का अभाव, और आपसी प्रतिस्पर्धा ने पत्रकारों की ताक़त को खोखला कर दिया है। न्यूज़रूम में टी.आर.पी. की दौड़, सोशल मीडिया पर वायरलिटी की होड़, इन सबमें असली पत्रकारिता धीरे-धीरे दम तोड़ रही है। पत्रकार कलम का सिपाही है। वह जनता के लिए लड़ता है, सत्ता से सवाल करता है, लेकिन अपने हक़, अपने अधिकार और अपने सम्मान के लिए लड़ने में पीछे हट जाता है। यही चुप्पी, यही बिखराव, उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। अगर पत्रकारिता को बचाना है, तो पहले पत्रकारों को खुद अपने अस्तित्व को बचाना होगा। यह समझना होगा कि चौथा स्तंभ तभी मजबूत रहेगा, जब उसे थामने वाले हाथ यानी पत्रकार, खुद मजबूत खड़े होंगे। समय की तलाश यही कहती है, अब पत्रकारिता को सिर्फ़ मिशन नहीं, आंदोलन की तरह जीना होगा।