पिछले 44 साल से बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बनने की बाट जोह रहा है वैश्य समाज

पिछले 44 साल से बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बनने की बाट जोह रहा है वैश्य समाज

Written by Prem Prakash Agarwal 2025-07-14 News
लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व बहुत जल्द उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष के नाम की घोषणा कर सकता है। ये तो निश्चित है कि केंद्रीय नेतृत्व, पार्टी के किसी कर्मठ और कैडर बेस कार्यकर्ता को ही प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व सौपेगा। सवर्ण, वैश्य,ओबीसी और दलित समाज के अनेक नेताओं के नाम चर्चा में हैं परन्तु प्रबल दावेदारों में डाक्टर दिनेश शर्मा, हरीश द्विवेदी, सुब्रत पाठक, रामशंकर कठेरिया, स्वतंत्र देव सिंह, केशव प्रसाद मौर्या, धर्मपाल सिंह, राजेन्द्र अग्रवाल, राजेश अग्रवाल व मनीष गुप्ता का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। सभी समीकरणों और विकल्पों पर गहन शोध हो रहा है। वैसे ये बात दीगर है कि पार्टी की स्थापना के समय से लेकर अब तक बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सिर्फ अगड़े या पिछड़े समाज के नेताओं के हिस्से में आयी है। उधर वैश्य समाज के प्रतिनिधित्व की बात करें तो तो सन् 1980 में तत्कालीन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष माधव प्रसाद त्रिपाठी से लेकर वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष चौधरी भूपेन्द्र सिंह के बीच 44 वर्षों के लंबे अंतराल में पार्टी के कोर वोटर वैश्य समुदाय के किसी नेता को बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी नसीब नहीं हुई है। विदित हो कि जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना काल से ही वैश्य समुदाय बीजेपी पार्टी का कट्टर समर्थक और मूल वोटर रहा है। इस लंबे अंतराल में अनेक बार चुनावी सोशल इंजीनियरिंग हुई और अन्य जातियों ने अपना पाला बदल कर भाजपा के खिलाफ वोट दिया परंतु वैश्य समुदाय हमेशा पूरे समर्पण के साथ भाजपा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहा। हालांकि पिछले कई वर्षों के भाजपा शासन काल में अनेक ऐसी नीतियों पर कार्य हुए हैं जो कि वैश्य और व्यापारी हितों के खिलाफ साबित हुए है। उससे आज वैश्य समुदाय भाजपा से निराश होकर उदासीन होता जा रहा है। यही कारण है कि पिछले लोकसभा चुनाव में उन तमाम महानगरों में जहां बनिया समाज बहुतायत रूप से निवास करता है, वहां जीत का अंतराल बहुत कम हो गया। मेरठ, आगरा, लखनऊ, वाराणसी, कानपुर आदि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। वैश्य समाज की उदासीनता के चलते बीजेपी उन तमाम जिलों की सीटें हार गई जिसे पार्टी का गढ़ समझा जाता रहा है। ऐसे में पार्टी किसी ऐसे लोकप्रिय और जमीन से जुड़े वैश्य नेता को आगे लाकर व्यापारी समुदाय के वोटरों को भाजपा के साथ जोड़ें रखने का भरसक प्रयास करेगी। यदि वास्तव में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व वैश्य समुदाय के किसी नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का निर्णय लेता है तो उसमें पार्टी के पास अनेक विकल्प हैं परंतु कद्दावर वैश्य नेता मनीष गुप्ता का नाम लिस्ट में सबसे ऊपर है। 38 वर्ष पूर्व बतौर वार्ड महामंत्री से अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करने वाले मनीष गुप्ता, निरंतर पार्टी को मजबूत करते चले आ रहे हैं और इधर बीच व्यापारी कल्याण बोर्ड के उपाध्यक्ष के तौर पर इन्होंने प्रदेश के हर जिले के वैश्य व्यापारी समुदाय के हितों की रक्षा की है। प्रदेश का कोई भी ऐसा जिला नही है, जहां मनीष गुप्ता के समर्थक बड़ी संख्या में निवास न करते हों। इनके प्रदेश अध्यक्ष बनने पर निश्चित ही वैश्य समाज के भीतर पनप रहे असंतोष को शांत किया कि जा सकता है। पार्टी की पुरानी परंपरा को देखें तो प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में कभी अगड़ी जाति व कभी पिछड़ी जाति के नेताओं को ही महत्व दिया गया है और इस कोशिश में किसी दलित और वैश्य नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनने का मौका आज तक नहीं मिल पाया है। वैसे जहां तक दलित समाज के प्रतिनिधित्व की बात है तो संगठन ने दो बार से महामहिम राष्ट्रपति व कई प्रदेशों के राज्यपाल इसी समाज से बनाये हैं। इसी के साथ साथ केंद्र व प्रदेश में कई कैबिनेट मंत्री व राज्य मंत्री दलित समाज के नेता बनाए गए हैं, परंतु इतना सब करने के बाद भी बीते लोकसभा चुनाव में दलित वोटर भाजपा के विरोध में ही खड़े रहे। वैसे भी उ प्र की जातिवाद आधारित दांव-पेंच को देखा जाए तो एक तरफ प्रदेश का मुख्यमंत्री और एक उपमुख्यमंत्री सामान्य कोटे से आते हैं वहीं दूसरी तरफ एक उपमुख्यमंत्री का पद ओबीसी समाज के हिस्से में आया है। अगर इस सोशल इंजीनियरिंग को ध्यान में रक्खा गया तो किसी वैश्य समाज के नेता को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की प्रबल संभावना है।