
पहले पराये अंग्रेज लूटते थे देश का धन, आज हमारे अपने नेता,अफसर लूट रहे हैं लाखों क्रांतिकारियों ने अपनी जान देकर जो आजादी दिलायी है वो आज भ्रष्टचार की पुनः गुलाम बन चुकी है
सुलतानपुर। ये हमारा दुर्भाग्य है कि आजाद भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ चला अन्ना हजारे का आंदोलन इंडिया अगेंस्ट करप्शन अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाया। इस देशव्यापी आंदोलन ने एक तरफ जहां सत्ता का परिवर्तन कर दिया वहीं अनेक नये नवीन लीडर भी देश को दिए। ये बात दूसरी है कि इस आंदोलन से उपजे ईमानदार नेताओं पर आज बेईमानी का आरोप लगा हुआ है और सबका बारी बारी से जेल में आना जाना लगा हुआ है। आज देश में करप्शन के हालात ये हैं कि गंदी नाली की मरम्मत हो या पटरी पगडंडी का निर्माण, ठेकेदार को एक निर्धारित कमीशन अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों की जेब में पहुंचाना अनिवार्य है। बिना कमीशन पहुचाएं कोई निर्माण नहीं हो सकता। यह भ्रष्ट सिस्टम हमारी सोसाइटी में व्यवहारिक रूप से इतना घुल-मिल गया है कि, कमीशनबाज नेता व अधिकारी इसे ईमानदारी का पैसा कहते हैं। कमीशन के नाम पर नेतानगरी व सरकारी विभाग की जारी अनवरत लूट पर अपना विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए समाजसेवी पत्रकार डी पी गुप्ता लिखते हैं कि भारत देश का जितना पैसा अंग्रेज सैकड़ों साल में नहीं लूट पाये उससे कहीं ज्यादा धन आजादी के बाद देश के कमीशन बाजों ने लूट लिया। कानून की किताब में कमीशनबाजी भले ही एक देश विरोधी , असंवैधानिक कार्य है परंतु आम जनता ने अघोषित रूप से इसे व्यवहारिक मान लिया है, और माने भी तो क्यों न, आम जनता देख रही है कि बिना कमीशन लिए दिए कोई सरकारी कार्य पूरा नहीं हो पा रहा है। दिल्ली में बैठ कर हमारे शीर्ष नेता आम जनता के संवैधानिक अधिकारों की बड़ी बड़ी बात करते हैं। परंतु जमीनी हकीकत ये है कि आम जनता से लिए गये टैक्स से जब आम जनता की सहूलियत के लिए कोई कार्य होता है तो ये ही नेता और अफसर उस निर्माण कार्य में कमीशन पहले ही वसूल लेते हैं। इस लूट में क्या बहुसंख्यक क्या अल्प संख्यक क्या अगड़ा क्या पिछड़ा सभी शामिल हैं। इस भ्रष्टाचार का अगर गंभीरता से अध्यन किया जावे तो पता चलता है कि भ्रष्टाचार की नदी ऊपर से नीचे की तरफ बहती हुई, आम जनता तक पहुंचती है। आज एक तरफ किसी अफसर को ट्रांसफर करवानी हो या मनचाही पोस्टिंग चाहिए तो उसे एक कीमत अदा करनी पड़ती है। यही हालात तो चुनाव में जीते जन प्रतिनिधियों का है जिन्हें चुनाव जीतने के लिए भारी भरकम रकम खर्च करनी पड़ती है। अब हालात ये हैं कि जब भारी भरकम रकम खर्च कर कोई नेता या अफसर आता है तो उसकी प्रार्थमिकता देश सेवा नहीं बल्कि अपनी खर्च की गई धनराशि को येन केन प्रकारेण वापस पाना होता है। भारत सरकार अगर कोई ऐसी नीति बनाए जिससे बिना लेन-देन के अधिकारियों की ट्रान्सफर पोस्टिंग हो सके और चुनाव इतना ज्यादा सस्ता हो कि एक मजदूर भी चाहे तो इसमें भाग ले सके तो देश में ईमानदार अफसर और जनप्रतिनिधियों की कोई कमी नहीं रहेगी।