
लार्ड इरविन से समझौते के वक्त यदि कड़ा रुख अपनाया जाता तो भगतसिंह की फांसी रुकने की पूरी संभावना थी
सुलतानपुर। आजादी की लड़ाई के दौरान क्रांतिकारियों के जो किस्से आज हम इतिहास के माध्यम से सुनते जानते हैं, जरूरी नहीं कि वो बिना छेड़छाड़ के अक्षरशः सत्य ही लिखा गया हो। उस वक्त की मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के रूख के अनुरूप क्रांतिकारियों से संबंधित खबरें प्रकाशित करता था। उस समय जो अंग्रेज चाहते थे वही समाचार पत्रों में प्रकाशित होता था और वही आज का इतिहास बन गया है। क्रांतिकारियों पर जो ज़ुल्म जेल की चहारदीवारी और अंग्रेजों की कस्टडी में हुए हैं उसकी दास्तां मौजूदा इतिहास से हजार गुना ज्यादा हैं जिनकी जानकारी भारतवर्ष की जनता को कभी नहीं हो सकती क्योंकि अंग्रेजों ने आजादी के पहले ही उन सभी दस्तावेजों को गायब कर दिया था और जो फाइलें किसी कारण बची रह गईं उसे आजादी के बाद अंग्रेजों के भारतीय चाटुकार नेताओं और अफसरों ने साजिश के तहत छिपा लिया। इस विषय पर इतिहास विषय से पोस्टग्रेजुएट समाजसेवी पत्रकार डी पी गुप्ता एडवोकेट का मानना है कि वायसराय लॉर्ड इरविन के साथ समझौता करते वक्त महात्मा गांधी यदि कड़ा रूख अपनाते तो भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी को टाला जा सकता था। विदित हो कि 5 मार्च 1931 को ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड इरविन और महात्मा गांधी के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ था। जिसमें सभी राजनैतिक बंदियों को रिहा करने की भी सहमति बनी थी परंतु भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को राजनैतिक बंदी के बजाय अपराधी माना गया। इन तीनों क्रांतिकारियों ने कौन से निजी स्वार्थ या जमीन जायदाद के झगड़े के लिए बंदूक उठाई थी। इन्होंने भी अंग्रेजों के खिलाफ भारत को गुलामी से आजादी दिलाने के लिए ही अपने तरीके से संघर्ष किया था। फिर इन्हें राजनैतिक कैदी के बजाय एक अपराधी क्यों माना गया। तमाम लोगों का भी यही मत है कि महात्मा गांधी यदि कड़ा रुख अपनाते तो बहुत संभव था कि इन तीनों क्रांतिकारियों की सजा फांसी से घटाकर कर आजीवन कारावास किया जा सकता था। उस समय देश की जनता भी यही चाहती थी कि महात्मा गांधी लार्ड इरविन से समझौता करते वक्त इन तीनों की फांसी जरुर रूकवायें परंतु दुखद पहलू है कि ऐसा हो नहीं पाया।