
बाल मजदूर बन नौनिहाल कर रहे परिवार का गुजारा, बचपन-भविष्य दोनों चौपट, अशिक्षा के अंधेरे से कैसे हो उजियारा
झाँसी | जिस उम्र में बच्चों के कंधों पर बैग और हाथ में किताब और पैंसिल होनी चाहिए उस उम्र में नौनिहालों के कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ है। बाल मजदूर बन ये नौनिहाल अशिक्षा के अंधेरे में अपने भविष्य की नींव रख रहे हैं शिक्षा विभाग के आंकड़ो में जहां प्रत्येक जरूरतमंद बच्चा स्कूल में जाकर अक्षर का ज्ञान ले रहा है, वहीं श्रम विभाग के अनुसार भी बाल मजदूरी पूरी तरह से बंद है, लेकिन हकीकत इनसे काफी परे है। आपको यकीन नहीं होगा कि जनपद में टिमटिमाने से पहले ही नौनिहालों के जीवन में अशिक्षा का अंधेरा छाया हुआ है और शिक्षा से दूर होटलों, रेस्टारेंट व चाय की दुकानों पर काम कर उनका बचपन और भविष्य चौपट हो रहा है। एक तरफ जहां केन्द्र व प्रदेश सरकार बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए शिक्षा व बाल कल्याण के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार सरकार की मंशा पर पूरी तरह से पानी फेर रहे हैं। जनपद में आज भी सैकड़ों बच्चे अपनी बदहाली पर आंसु रो रहे हैं, लेकिन संबंधित विभाग के अधिकारी केवल आंकड़ों को दुरूस्त करने में जुटे हुए हैं। उन्हें न तो सड़कों पर कूडा बीनते हुए बच्चे नजर आ रहे हैं और न ही होटल, रेस्टोरेंट या फिर चाय की दुकान पर बर्तन साफ करने वाले बच्चे। टिमटिमाने से पहले ही बच्चों का उज्जवल भविष्य अंधेरे में डूब चुका है। जब नगर व देहात क्षेत्र में हमारी टीम ने जब जरूरतमंद बच्चों की हालत की हकीकत जानने की कोशिश की, तो नौनिहालों का उज्जवल भविष्य होटलों, रेस्टोंरेट व चाय की दुकानों सहित कूड़ा बीनते समय बर्बाद होता नजर आया।