
जिला कृषि अधिकारी/ जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने किसानों को बताएं फसल में लगने वाली बीमारियों से बचाव करने के उपाय
श्री के के सिंह,जिला कृषि रक्षा अधिकारी/ जिला कृषि अधिकारी ने जनपद के विभिन्न गावों में भ्रमण करके रबी सीजन की प्रमुख फसलों जैसे-गेंहू, आलू, सरसों, राई, चना, मटर में लगने वाले कीटों तथा रोगों का सर्वेक्षण किया तथा वर्तमान में तापमान में आई गिरावट एवं आद्रता वृद्धि के कारण फसलों में लगने वाले रोगों एवं कीटों के प्रकोप की सम्भावना के मद्देनजर बचाव एवं नियंत्रण हेतु निम्न प्रकार एडवाइजरी करके कृषको को विभिन्न प्रबन्धन एवं निंयत्रण उपायों को अपनाने की सलाह दी गई। उन्होंने बताया कि गेंहूॅ-पीली गेरूई- इस रोग में गेंहू के पौधों की पत्तियों पर पीले रंग की धारियॉ पाई जाती है, जो अत्याधिक प्रकोप की स्थिति में ये पीली धारियॉॅ लीफ शीथ (कंचुल) तक बढ जाती है। पत्तियों को छूने पर पीले रंग का पाउडर अंगुलियों पर भी लग जाता है। इसके प्रकोप से पौधे कमजोर एवं अल्प विकसित एवं बालियॉ छोटी और दाने सिकुड़ जाते हैं तथा समय पर रोकथाम के अभाव में उत्पादन काफी गिर जाता है। बचाव हेतु गेरूई अवरोधी गेहू प्रजातियॉ जैसे- पी0बी0डब्लू-723, एच0डी0-3086, डी0बी0डब्लू-621, डी0बी0डब्लू-50 आदि की बुवाई किसान भाई करें, साथ ही संतुलित उर्वरकों के प्रयोग के साथ पोटास का भी प्रयोग करें। जिला कृषि रक्षा अधिकारी श्री के के सिंह ने बताया कि किसान भाई खेंतो की नियमित निगरानी करते रहें तथा पीली गेरूई के पौधों पर लक्षंण दिखाई देने पर प्रोपीकोनाजोल 25 प्रति0 ई0सी0 की 500 एम0एल0 या एजोक्सी स्ट्रोबिन 11 प्रति0+टेबुकोनाजोल 18.3 प्रति0 एस0सी0 की 750 एम0एल0 मात्रा को 400-500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करना चाहिए। जनपद में विकासखण्ड चिरगांव अन्तर्गत बरुआसागर क्षेत्र में आलू-पछेत झुलसा की जानकारी देते हुए बताया कि। इसका प्रकोप जनवरी माह से फरवरी माह के मध्य तक जब तापक्रम 10-20 डिग्री0से0 एवं आद्रता 80 प्रति0 या अधिक होती है तब अधिक दिखाई देता है। पछेती झुलसा से प्रभावित आलू के पौधो की पत्तियों के अग्रभाग पर अनियमति आकार के काले एवं भूरे धब्बे दिखाई देते है, जो अत्यधिक प्रकोप की दशा में बढकर पूरी पत्ती को चपेट में ले लेते है तथा अन्ततः पूरी फसल ही झुलस जाती है। इस रोग के बचाव हेतु प्रतिरोधी प्रजातियों जैसे-कुफरी सिन्दूरी, कुफरी नवीन, कुफरी अलंकार आदि की बुआई कृषक भाइयों को करने की सलाह दी जाती है। पछेती झुलसा के लक्षण पौधों पर दिखाई देने पर किसान भाई सिचाई तत्काल रोक दे तथा फसल में कापर आक्सीक्लोराइड 50 प्रति0डब्लू0पी0 की 2.5 किलोग्राम मात्रा अथवा मेंनकोजेब 75 प्रति0डब्लू0पी0 अथवा जिनेब 75 प्रति0डब्लू0पी0 की 1.5 से 2.0 किलोग्राम मात्रा अथवा हेक्साकोनाजोल 2 प्रति0एस0सी0 की 3.0 किलोग्राम मात्रा को प्रति हेक्टेयर 500-600 ली0 पानी के साथ मिलाकर छिडकाव करने की सलाह कृषक को दी। ज़िला कृषि रक्षा अधिकारी ने जनपद के किसानों को चना/मटर-बुकनी रोग की जानकारी देते हुए बताया कि इस रोग में पत्तियों, तनो व फलियों पर सफेद रंग का चूर्ण दिखाई देता जो छूने पर उंगलियों पर लग जाता है, जिसके कारण पत्तियां सूखकर गिर जाती हैं। इस रोग से बचाव हेतु प्रतिरोधी प्रजातियों यथा पंत मटर-5 मालबीन मटर-2 रचना आदि का चयन बुवाई हेतु करना चाहिए। किसान भाई बुकनी रोग के नियंत्रण हेतु घुलनशील गंधक 80 प्रति0 की 2.0 कि0गा्र0 मात्रा अथवा ट्राइडेमेफान 25 प्रति0 डब्लू0पी0 की 250 ग्रा0 मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें। ज़िला कृषि अधिकारी श्री केके सिंह ने उक्त के क्रम में सभी कृषक भाईयों को सलाह दी कि कृषि विभाग की कृषि रक्षा अनुभाग द्वारा संचालित सहगामी फसल की निगरानी एवं निदान प्रणाली (PCSRS) कार्यक्रम के अन्तर्गत दो टोल फ्री मोबाइल संख्या 9452247111 अथवा 9452257111 पर एस0एम0एस अथवा व्हाटसएप के माध्यम से अपनी कीट/रोग सम्बन्धी शिकायतें दर्ज करायें तथा अपनी समस्या का समाधान अपने ही मोबाइल पर प्राप्त करते हुये संस्तुतियों को अपनाकर अपनी फसलों को कीट/रोग/खरपतवारों के प्रकोप से सुरक्षित करें।